Astanga Yoga,अष्टांग योग



     Astanga Yoga, अष्टांग योग 

यम, नियम, आसन, प्राणायाम, 

प्रत्याहार, धारणा ,ध्यान ,समाधि


भारतीय आस्तिक दर्शनों में 'योगदर्शन' ही एक ऐसा दर्शन है, जो मानव जीवन में अध्यात्म, वाद-विवाद या तर्कशास्त्र को महत्व न देते हुए जीवन के उत्थान के लिए और मानव देह के व्यवहारिक प्रयोगात्मक पक्ष पर विशेष बल देता है। यही कारण है कि इस दर्शन में आसन, योग पक्रिया, प्राणायाम, व्यायाम आदि के माध्यम से आध्यात्मिक उपलब्धि पाने की बात दर्शाई गई है। योग ही वर्तमान भौतिक युग में एक ऐसा सरल साधन है जो व्यक्ति को शारीरिक तथा मानसिक रूप से स्वस्थ रखने में सक्ष्म है। योग के माध्यम से शरीर तथा मन दोनों को सबल बनाया जा सकता है। योग आत्मविद्या का बीज है। उसकी साधना से चेतना पर छाया आवरण दूर होता है। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन रहता है। स्वस्थ मन में ही निर्मल भावना का विकास होता है। निर्मल भावना से व्यक्ति का ही नहीं वरन सारे राष्ट्र  और मानवता का विकास होता है। योग व्यक्ति की चेतना को जागृत करता है तथा उसके मन में निर्मल भाव पैदा करता है। योग ही एक ऐसा  सबल साधन है जो मनुष्य को संपूर्ण रूप से स्वास्थ्य प्रदान करने में सहायक होता है। इसी विशेषता के कारण प्राचीन काल से लेकर आज तक योग अपनी उपयोगिता बनाए हुए देश काल की  सीमाओं को लांघ कर योग अब 'योगा' बनकर विदेशों में भी खूब प्रचलित हुआ है।
                    योग दर्शन भारतीय दर्शनशास्त्र की एक अत्यंत प्राचीन शाखा है।  भारतीय मूल ग्रंथ वेद शास्त्र उपनिषदों में योग का विवरण और उसकी विशेषताओं का वर्णन मिलता है। परंतु इन ग्रंथों में योग विशृंखलित रूप में पाया जाता है।याज्ञवतल्क्य-स्मृति के अनुसार हिरण्यगर्भ योग के रचनाकार माने जाते हैं।  परंतु योग को व्यवस्थित रूप देने का श्रेय महर्षि पतंजलि को जाता है। यद्यपि महर्षि पतंजलि ने योग का मात्र अनुसंधान किया अर्थात प्रतिपादित शास्त्र का उपदेश मात्र दिया है। वे योग के प्रवर्तक न होकर प्रचारक या संशोधक मात्र हैं। महर्षि पतंजलि ने योग दर्शन को अपने विवेक के अनुसार एक व्यवस्थित रूप देकर योगसूत्र नामक ग्रंथ में प्रतिपादित किया। परंपरा के अनुसार योग सूत्र के रचयिता और व्याकरण महाभाष्य के निर्माता महर्षि पतंजलि एक ही व्यक्ति है।                            'पतंजलि योग सूत्र'  का रचनाकाल विक्रम पूर्व द्वितीय शताब्दी में हुआ माना जाता है। योग का ज्ञान साधारण जन तक पहुंचाने के लिए उसे और सरल रूप में  "अष्टांग योग" के रूप में प्रतिपादित किया ।  अष्टांग योग एक ऐसा पथ है जिस पर निर्भय होकर पूर्ण स्वतंत्रता के साथ दुनिया का प्रत्येक इंसान चल सकता है। तथा जीवन में पूर्ण स्वास्थ्य,सुख ,शांति व आनंद को प्राप्त कर सकता है।
        महर्षि पतंजलि ने अष्टांग योग में आठ अंग यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि का समावेश किया है जिनका  वर्णन इस प्रकार है  ---

(1) यम  --- प्रथम अंग है 'यम' इसके अंतर्गत अहिंसा, सत्य असत्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आते हैं। संक्षेप में इन्हें यूं समझा जा सकता है।
(i) अहिंसा -- मन, वचन, कर्म से किसी भी प्राणी को कष्ट न पहुंचाना अहिंसा है।
(ii) सत्य -- मन,कर्म, वचन में यथार्थ होना अर्थात जैसा देखा, सुना, अनुमान किया गया हो उसी प्रकार मन और वचन को रखना।
(iii) अस्तेय -- अर्थात दूसरे के धन की चोरी या अपहरण न करना और न उसकी इच्छा करना।
(iv) ब्रह्मचर्य -- इंद्रियों में विशेषकर गुप्त इंद्रियों में लोलुपता न रखना और कामवासना का निरोध इसमें प्रमुख है।
(v) अपरिग्रह -- अर्थात लोभवश  अनावश्यक वस्तु ग्रहण न करना। संग्रहवृत्ति का निषेध अपरिग्रह है।

(2) नियम  ----: अष्टांग योग का दूसरा अंग नियम है। नियम की परिभाषा है - नियमयान्ति  प्रेरयन्तीति नियमः अर्थात् जो (शुभ कार्यों में) मन व चित को प्रेरित करते हैं, वह नियम कहलाते है। नियम  पांच प्रकार के होते हैं जिनका वर्णन इस प्रकार है ----
(i) शौच -- शौच का अर्थ शुद्धि होता है। इसके अंतर्गत भाह्य एवं अभ्यांतर दोनों शुद्धियां आती हैं। स्नान, पवित्र भोजन आदि के द्वारा शारीरिक शुद्धि तथा मैत्री, करुणा आदि के द्वारा मानसिक शुद्धि प्राप्त करना ही शौच है।
(ii) संतोष -- उचित प्रयास से जितना भी प्राप्त हो सके उसमे संतुष्ट रहना और इसी प्रकार भौतिक पदार्थों की लालसा न रखकर अध्यात्म की ओर चित्त की प्रवृत्तियों को उन्मुख रखना ही संतोष है।
(iv) तप -- सुख-दुख, सर्दी-गर्मी आदि में रहने का अभ्यास करना तथा कठिन बातों की अनुपालना करना तप में आता है। (v) स्वाध्याय --- चित्त की बहिर्मुखी प्रवृत्तियों को अवरुद्ध कर उन्हें अंतर्मुखी बनाने के लिए वेद, उपनिषद् आदि ग्रंथों का अध्ययन करना और उन पर मनन करना स्वाध्याय कहलाता है।
(vi)  ईश्वर प्रणिधान ---- ईश्वर का ध्यान तथा उसके चरणों में पूर्ण समर्पण कर देना ही 'ईश्वर प्रणिधान' कहलाता है।

(3) आसन --- चित्त को स्थिर रखने वाले तथा सुख पूर्वक बैठने के प्रकार को 'आसन' कहते हैं। आसनों के अनेक भेद हैं पद्मासन, वीरासन, भद्रासन, शीर्षासन, गरुड़ासन, मयूरासन, स्वशासन आदि। योग दर्शन के 'व्यासभाष्य', 'तत्ववैशारदी' तथा 'योगवार्तिक' आदि ग्रंथों में विभिन्न आसनों का वर्णन है। 'योग-सिद्धांत चंद्रिका' में तो आसनों का बहुत विस्तृत वर्णन है। आसन शरीर को स्वस्थ, हल्का और योग साधना के अनुकूल बनाते हैं। इसके अतिरिक्त आसनों के अभ्यास से मन की एकाग्रता सिद्ध करने में सफलता मिलती है। ध्यान तथा समाधि के लिए स्थिर आसन होना जरूरी है।

(4) प्राणायाम --- स्थिर आसन से ही श्वास-पतिश्वास की गति नियंत्रित होती है। श्वास-प्रतिश्वास की स्वाभाविक गति के नियंत्रण को प्रणायाम कहते हैं। इसके चार भेद है --
(i) पूरक -- पूरा श्वास भीतर खींचना पूरक कहलाता है।
(ii) कुंभक --  श्वास को भीतर रोकना कुंभक कहलाता है।
(iii) रेचक -- श्वास को बाहर छोड़ना रेचक कहलाता है।
(iv)बाह्य चुंबक --  श्वास को बाहर रोके रखना बाह्य कुंभक कहलाता है।
प्राणायाम द्वारा शरीर- मन दृढ  होते हैं तथा चित्त एकाग्र होता है। इससे समाधि की अवधि भी बढ़ाई जा सकती है। प्राणायाम के द्वारा शरीर के सभी रोगों को समाप्त किया जा सकता है। आधुनिक युग में स्वास्थ संबंधी अनेक रोगों के लिए चिकित्सक भी प्राणायाम जरूरी बताते हैं।

(5) प्रत्याहार --- प्रत्याहार का शाब्दिक अर्थ है - प्रतिकूल, आहार-वृति अर्थात इंद्रियों को अपने बाह्य विषयों से हटाकर उन्हें अंतर्मुखी बना देना ही 'प्रत्याहार' है। इंद्रियों की सहज वृत्ति बहिर्मुखी होती है। दृढ़ संकल्प तथा कठिन इंद्रिय निग्रह से यह प्रवृत्ति अंतर्मुखी हो जाती है। इन पांच साधनों को बहिरंग कहा जाता है। अष्टांग योग के शेष तीन साधन अंतरंग कहलाते हैं। इनके माध्यम से ही योग का चरम लक्ष्य पूर्ण होता है।

(6) धारणा --- चित को किसि स्थान में स्थिर कर देना धारणा है। यह स्थान  किसी विशेष तत्व जैसे सूर्य या किसी देवता की प्रतिमा आदि भी हो सकते हैं। और अपने शरीर में नाभि चक्र हतकमल, भौहों के मध्य भाग भी हो सकते हैं। धारणा की सिद्धि से ही समाधि की अवस्था तक पहुंचा जा सकता है।

(7)  ध्यान -- किसी स्थान में ध्येयवस्ततु का ज्ञान जब एक प्रभाव में सलंग्न होता है, तब उसे ध्यान कहते हैं। इसमें ध्येय का निरंतर मनन किया जाता है, जिससे विषय का स्पष्ट ज्ञान हो जाता है। इसमें पहले भिन्न-भिन्न अंशों या स्वरूपों का बोध होता और फिर ध्येय के यथार्थ रूप का ज्ञान होता है।

(8) समाधि --- समाधि शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है -- 'सम्यगाधीयते एकाग्रीक्रियते विक्षेपान् परिह्यत्य मनो यत्र स सम्मानः'। अर्थात ध्यान ही जब ध्येय के रूप में भाषित हो और अपने  स्वरूप को छोड़ दें, तब वही समाधि है। इसमें केवल ध्येय रहता है, ध्यान और ध्याता का भाव नहीं होता। ध्याता का ध्याय और ध्येय एक हो जाते हैं।


Comments

Popular Posts

Mal Kangni ke fayede in hindi मालकांगनी ( ज्योतिषमति) के फायदे

आधुनिक युग में आयुर्वेदिक चिकित्सा कीआवश्यकता, आज के युग में आयुर्वेद का महत्व,

सफेद मूसली के फायदे।, Safedmusli benefits in Hindi