आंवला AMLA, आंवला के फायदे, मधुमेह में आंवला का प्रयोग

आंवला AMLA


आंवला एक दिव्य औषधीय फल है। यह रसायन द्रव्यों में सर्वश्रेष्ठ है।। इसमें विटामिन सी के साथ-साथ अन्य पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में होते हैं जो हमारे स्वास्थ्य के लिए उत्तम माने जाते हैं। आंवले का विधि पूर्वक सेवन करने से मनुष्य पर बुढ़ापा प्रभावी नहीं हो पाता। इसलिए आयुर्वेद में इसे अमृत फल या धात्री फल की संज्ञा दी गई है। आयुर्वेदिक ग्रंथों में आयुर्वेद आचार्यों ने इस फल को  स्वास्थ्य के लिए सर्वश्रेष्ठ बताया है। सनातन धर्म के प्राचीन ग्रंथों में इसे दिव्य फल की उपाधि देते हुए इसकी पूजा करने के विधान का वर्णन किया है। विशेषकर अक्षय तृतीया पर आमला फल के द्वारा पूजा करने का विधान बताया गया है। ग्रंथों में इसे देवताओं का प्रिय अमृत फल बताते हुए इसकी महिमा का वर्णन किया है। यह त्रिदोष नाशक है और किसी भी शारेरिक प्रकृति का व्यक्ति विधि पूर्वक इसका सेवन करके स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर सकता है।

आंवले का रासायनिक संघठन 

आंवले के फल में विटामिन सी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। इसमें नारंगी से 20 गुना अधिक मात्रा में विटामिन सी पाया जाता है। आंवले में टैनिक, एसिड, गैलिक, एसिड, शर्करा निर्यास, एल्युमिन,सैल्युलोज तथा कैल्शियम पाया जाता है। इसके बीजों में एक तेल भी पाया जाता है

आंवला फल के कल्क और स्वरस में प्रति 100 ग्राम पाए जाने वाले घटक निम्न अनुपात में पाए जाते है।
जल की मात्रा  ------   81 .2    मिलीग्राम
प्रोटीन           ------   0.5        मिलीग्राम
कैल्शियम      ------   0.0 5     मिलीग्राम
लौह             ------   1.2        मिलीग्राम
निकोटिनिक   ------   0.2        मिलीग्राम


आंवले के गुण धर्म

(1) ग्राही, मूत्रल, रक्तशोधक और रुचिकाकार होने से आंवला मधुमेह, अतिसार, प्रेमह, कामला, दाह, अम्लपित्त, विस्फोटक , पांडु, बध्दकोष्ट, अजीर्ण, अरुचि, श्वास, खांसी इत्यादि रोगों को नष्ट करता है।  दृष्टि तेज करता है। वीर्य को दृढ करता है और आयु की वृद्धि करता है।
(2) आंवला त्रिदोष नाशक है। अम्ल से वात, मधुर शीत से पित तथा रुक्षकषाय होने की वजह से कफ का नाश करता है।
(3) यह कुष्ठ रोग को दूर करने वाला, ज्वर का नाश करने वाला और एक रसायनिक गुण वाला फल है।
(4) आंवला हृदय को बल देने वाला और सोणितस्थापन गुण वाला फल है।
(5) वृश्य और गर्म स्थापन है।
(6) यह प्रमेह नाशक और अग्निदीपन होने के कारण विषमज्वर का नाश करता है।
(7) आवंला मधुर तिक्त कषाय गुण वाला त्रिदोष नाशक होता है।


आंवले के औषधीय प्रयोग

आंवले के फायदे


मधुमेह में आंवले का प्रयोग

आंवला विटामिन सी के साथ-साथ कई पोषक तत्वों से भरपूर होता है। इसमें क्रोमियम नमक खनिज पदार्थ होता है जो शरीर में कार्बोहाइड्रेट को पाचन करने मे  मदद करता है। और शरीर में ब्लड शुगर को संतुलित रखने के लिए इंसुलिन के प्रति ज्यादा क्रियाशील बनता है। यह फल इंसुलिन के प्रति शरीर को अधिक क्रियाशील बनाता है। जिससे इंसुलिन का अवशोषण बढ़ जाता है और शरीर में ब्लड शुगर संतुलित रहती है। इसलिए यह मधुमेह रोग में बहुत ही गुणकारी औषधि मानी जाती है।

(i) 25ml आंवले का स्वरस  जल के साथ सुबह खाली पेट और शाम को भोजन से 2 घंटे पूर्व लगातार सेवन करने से मधुमेह रोग में आश्चर्यजनक लाभ देखने को मिलता है। इसमें इस बात का विशेष ध्यान रखें कि जब आप सुबह इसका सेवन करें तो उसके 80 मिनट बाद तक किसी भी पेय या खाद्य पदार्थ का सेवन न करें।
(ii) 4 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम आंवला चूर्ण लगातार सेवन करने से मधुमेह रोग में अवश्य ही लाभ मिलता है इसमें कोई संदेह नहीं।



उच्च रक्तचाप में आंवले का प्रयोग

आंवला त्रिदोष नाशक है। इसमें रक्तशोधक औषधीय गुण पाए जाते हैं। आंवला शरीर में उन तत्वों को नियंत्रित करता है जिनसे उच्च रक्तचाप बढ़ता है। आंवले में विटामिन सी के साथ-साथ कई अन्य पोषक तत्व मौजूद होते हैं, और इसमे एंटी ऑक्सीडेंट गुण होने के कारण शरीर में रक्त शोधन का कार्य करता है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के शोध में भी यह पाया गया है कि नियमित आंवला के सेवन से उच्च रक्तचाप जैसे रोग में अवश्य ही लाभ मिलता है।
           
                  दो से चार ग्राम की मात्रा में आंवले का चूर्ण सुबह खाली पेट जल के साथ तथा रात को सोते समय जल के साथ नियमित 1 वर्ष तक सेवन करने से उच्च रक्तचाप रोग अवश्य ही समाप्त हो जाता है। जब भी आंवले का सेवन करें तब 2घंटे पहले और 2 घंटे बाद तक कुछ खाद्य पदार्थ का सेवन न करें। यद्यपि इसके सेवन से आरंभ से ही आराम मिलना शुरू हो जाता हैं। परंतु अच्छे परिणाम के लिए लगातार 1 वर्ष तक इसका सेवन करना चाहिए ऐसा करने से रोगी पूर्ण रूप से  स्वस्थ हो जाता है।




नेत्र रोग मे आंवले का प्रयोग

(i) 50 ग्राम सूखे आंवलो को कूटकर कर आधा किलो पानी में डालकर तब तक उबालना है जब वह 50 ग्राम शेष रह जाए फिर उसे ठंडा करके चार तह के कपड़े से छानकर शीशी में भरकर रख लें। इस जल को आंखों में डालने से नेत्र के रोग समाप्त हो जाते हैं। परंतु इसमें ध्यान रखें कि यह जल केवल चार दिन तक ही प्रयोग करे उसके बाद दूसरा जल तैयार कर ले।

(ii) ताजे आंवले का रस और उसमें समान मात्रा में जल मिलाकर कपड़े से छान लें फिर उसको आंखों में डालने से आंखों में आया फूला मिट जाता है।

(iii) 10 ग्राम आंवला चूर्ण और 10 ग्राम शहद मिलाकर सुबह दूध के साथ 6 महीने तक सेवन करने से आंखों की रोशनी अवश्य ही बढ़ जाती है।


बाल काले करने के लिए आंवले का प्रयोग

(i) आंवला चूर्ण 30 ग्राम, बहेड़ा 10 ग्राम, लौह चूर्ण 10 ग्राम और 50 ग्राम आम की गुठली का चूर्ण इन सभी औषधियों को मिलाकर शाम को लोहे की कढ़ाई में भिगोकर रख दें सुबह इससे बालों पर लेप करने से असमय हुए सफेद बाल पुनः काले हो जाते हैं। अच्छे परिणाम के लिए इस प्रयोग को लंबे समय तक करना चाहिए।

(ii) आवंला, रीठा, शिकाकाई तीनों का क्वाथ बनाकर बालों में लगाने से बाल घने, काले और लंबे होते हैं।


अम्ल पित्त में आंवले का प्रयोग

(i) ताज़ा आंवले का 50 ग्राम रस लेकर उसमें एक चम्मच शहद मिलाकर सुबह खाली पेट सेवन करने से अम्लपित्त के रोग में अवश्य ही लाभ मिलता हैं। परंतु इसमें इस बात का विशेष ध्यान रखें कि आंवले के रस  सेवन करने के एक घंटे बाद तक  किसी अन्य पेय एवं खाद्य पदार्थों का सेवन न करें।

(ii) आंवले के बीज 20 ग्राम की मात्रा में लेकर रात को भिगोकर रख दें। सुबह ढाई सौ ग्राम गाय के दूध में घोटकर इसको खाली पेट एक महीने तक सेवन करने से शरीर में बिगड़ा हुआ पित्त का रोग भी ठीक हो जाता है।

(iii) 25 ग्राम आंवले का स्वरस जल में मिलाकर दिन में दो-तीन बार सेवन करने से अम्लपित्त, खट्टी डकार, गैस, एसिडिटी जैसे रोगो में लाभ मिलता है।


संग्रहणी रोग में आंवले का प्रयोग

आंवले के पत्तों और मेथी दाना का क्वाथ बनाकर 10 से 20 ग्राम की मात्रा में दिन में दो बार एक महीने तक सेवन करने से दुष्ट संग्रहणी रोग समाप्त हो जाता है।


पीलिया रोग में आंवले का प्रयोग

आंवले की चटनी बनाकर उसमें शहद मिलाकर दिन में दो-तीन बार सेवन करने से पीलिया रोग में लाभ मिलता है और  यकृत (लिवर) की कमजोरी दूर होकर कामला जैसे रोग से छुटकारा मिलता है।


कब्ज रोग में आंवले का प्रयोग

4 ग्राम की मात्रा में आंवले का चूर्ण दिन में दो बार गुनगुने जल के साथ तथा रात को सोते समय गर्म दूध के साथ कुछ दिन सेवन करने से कब्ज रोग अवश्य ही मिट जाता है और आंते मजबूत हो जाती हैं। लंबे समय से कब्ज रोग से पीड़ित रोगियों को रात के समय दूध के साथ 5 ग्राम आंवले का चूर्ण प्रतिदिन लंबे समय तक सेवन करना चाहिए। ऐसा करने से धीरे-धीरे कब्ज का रोग बिल्कुल समाप्त हो जाता है।


शुक्रमेह रोग में आंवले का प्रयोग

आंवले का चूर्ण 10 ग्राम तथा दोगुनी मात्रा में मिश्री मिलाकर ताजे जल के साथ सुबह खाली पेट लगातार एक महीने तक सेवन करने से शुक्रमेह तथा स्वप्नदोष आदि रोग  ठीक हो जाते हैं। इसमें विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि जब आप खाली पेट इस औषधि का सेवन करें तो उसके एक घंटे बाद तक कोई भी पेय या खाद्य पदार्थ का सेवन न करें। इस औषधि के अच्छे परिणाम के लिए चाय आदि का सेवन न करें।


रक्त अतिसार में आंवले का प्रयोग

बीज ग्राम आंवले का रस, 10 ग्राम शहद और 5 ग्राम घी लेकर तीनों को मिलाकर ढाई सौ ग्राम बकरी के दूध के साथ सेवन करने से रक्त अतिसार में अवश्य ही लाभ मिलता है।


प्रमेह रोग में आंवले का प्रयोग

(i) आंवला हरड़ बहेड़ा नागर मोथा, दारू हल्दी और देवदारू सभी को 20-20 ग्राम की मात्रा में लेकर आधा किलो जल में डालकर क्वाथ तैयार कर लें। इस क्वाथ को दिन में तीन बार 20 से 30 ग्राम की मात्रा में लगातार 30 दिन तक सेवन करने से प्रमेह रोग में अवश्य ही लाभ मिलता है।

(ii) आंवला, गिलोय, नीम की छाल, परवल की पत्ती, प्रत्येक को 20- 20 ग्राम की मात्रा में लेकर शाम को आधा किलो पानी में भिगोकर रख दें सुबह इस पानी से क्वाथ तैयार कर ले अर्थात आग पर पकाएं जब यह चतुर्थांश चौथा भाग शेष रह जाए तो इसे ठंडा कर 25 ग्राम की मात्रा में एक चम्मच शहद मिलाकर दिन में तीन बार लगातार 30 दिन तक सेवन करने से पित्तज प्रमेह  रोग में अवश्य ही लाभ होता है।


रक्त प्रदर में आंवले का प्रयोग

कई बार माता बहनों को रक्त प्रदर रोग हो जाता है। ऐसी स्थिति में आंवले का 20 ग्राम रस में 1 ग्राम भुने हुए  जीरे का चूर्ण मिलाकर दिन में तीन बार लगातार पंद्रह दिन तक सेवन करने से रक्त प्रदर समाप्त हो जाता है। यदि ताजे आंवले उपलब्ध न हो तो शाम के समय आंवला चूर्ण को पानी मे भिगोकर रख दें और सुबह उसका औषधि के रूप में प्रयोग कर सकते हैं।


श्वेत प्रदर मे आंवले का प्रयोग

लगभग 25 ग्राम आंवले के चूर्ण को आधा किलोग्राम जल में भिगोकर रख दें सुबह उस पानी को छानकर उसमें 10 ग्राम मिश्री और 10 ग्राम शहद मिलाकर खाली पेट लेने से श्वेत प्रदर रोग समाप्त हो जाता है। इस औषधि को लेते समय चाय कॉफी का सेवन न करें और लगातार 1 महीने तक इसका सेवन करने से अच्छे परिणाम मिलते हैं।


मंदाग्नि में आंवले का प्रयोग

आवंलो को उबालकर उन के टुकड़े करके सुखाकर चूर्ण तैयार कर ले। अब इस चूर्ण में काली मिर्च, सोंठ, सेंधा नमक, भुना हुआ जीरा और हींग समान मात्रा में मिलाकर औषधि प्यार कर कर रख ले। 4 ग्राम की मात्रा में दिन में 2 बार इस औषधि का सेवन करने से मंदाग्नि, अरुचि और पेट में गैस, बाय संबंधित रोग समाप्त हो जाते  है।


पांडु रोग में आंवला का प्रयोग

2 ग्राम आमला रसायन का चूर्ण और 100 मिलीग्राम लौह भस्म मिलाकर एक खुराक तैयार कर ले। एक खुराक सुबह और एक खुराक शाम को 40 दिन तक सेवन करने से रक्त अल्पता और पांडु रोग आदि समाप्त हो जाते हैं। इस औषधि के सेवन से शरीर में आयरन की मात्रा की भी पूर्ति हो जाती है।


योनि दाह में आंवले का प्रयोग

50 मिलीग्राम आंवले का रस और उसमें 10 ग्राम शहद और 10 ग्राम मिश्री मिलाकर सेवन करने से योनि दाह में आश्चर्यजनक लाभ मिलता है।


गठिया रोग में आंवला का प्रयोग

20 ग्राम आंवले का चूर्ण और 20 ग्राम गुड़ को 500 ग्राम पानी में डालकर उबालें और जब वह पानी 250 ग्राम शेष रह जाएं तो उसे ठंडा  करके छान कर  सुबह खाली पेट लगातार 40 दिन तक सेवन करने से गठिया जैसा भयंकर रोग भी समाप्त हो जाता है।


कुष्ठ रोग में आंवले का प्रयोग

5 ग्राम आंवले का चूर्ण और समान मात्रा में नीम की पत्ती का चूर्ण लेकर शहद के साथ मिलाकर सुबह खाली पेट  60 दिन लगातार सेवन करने से कुष्ठ रोग  समाप्त हो जाता है। इस औषधि के सेवन से खाज खुजली जैसे रोग भी समाप्त हो जाते हैं।


पित्त रोग में आंवले का प्रयोग

सुबह खाली पेट आंवले का मुरब्बा प्रतिदिन सेवन करने से पित्त रोग समाप्त हो जाता है और अन्य कई प्रकार के शारीरिक स्वास्थ्य लाभ होते हैं।























Comments

Popular posts from this blog

आधुनिक युग में आयुर्वेदिक चिकित्सा कीआवश्यकता, आज के युग में आयुर्वेद का महत्व,

वर्तमान समय में आयुर्वेद का स्वरूप और महत्व, भारत में आयुर्वेद के राष्ट्रीय स्तर के संस्थान

रोग क्यों वह कैसे होते हैं, रोगों के कारण