आयुर्वेदिक शास्त्र की भूमिका , आयुर्वेद का अर्थ, आयुर्वेद की परिभाषा, आयुर्वेद का इतिहास, आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथ (Ayurvedic)

                          श्री गणेशाय नमः 
आयुर्वेद शास्त्र भारतीय ग्रंथो की परंपरा में प्राचीनतम चिकित्सा सिद्धांत का ज्ञान माना जाता है। आयुर्वेद शास्त्र को विद्वानों ने उपवेद की संज्ञा दी है। भारतवर्ष के सबसे प्राचीन ग्रंथ वेदों से ही इसका प्रादुर्भाव हुआ माना जाता है। जिसके  विषय में अनेक  ऋषियों, आयुर्वेदाचार्यो और विद्वानों ने अपने अपने मतानुसार आयुर्वेदिक ग्रंथों की रचना करके मानव जाति को कृतार्थ किया है। भारतवर्ष के महान ऋषियों ने अपना ज्ञान प्रदान करके मानव जाति पर बहुत बड़ा उपकार किया है। इन महात्माओं को हम शत-शत नमन करते हैं।

भूमिका :-
आयुर्वेद के विषय में भारतवर्ष के सबसे प्राचीन धार्मिक ग्रंथ वेदों में विवरण दिया गया है।  वर्तमान समय में उपलब्ध  प्राचीनतम ग्रंथ चरक संहिता, भेल संहिता और सुश्रुत संहिता आदि प्रचलन में हैं । इनमें  से चरक संहिता कायाचिकित्सा प्रधान तंत्र है और सुश्रुत शल्यचिकित्सा प्रधान हमको यहां चरक संहिता के संबंध में  कुछ कहना है, चरक संहिता के निर्माण के समय  भी आयुर्वेद के अन्य ग्रंथ विद्यमान थे। चरकसंहिता में स्पष्ट कहा गया है कि इस समय भी विविध चिकित्सा शास्त्र प्रचलित है। परंतु काल खण्ङ का विवरण  वास्तविक  उपलब्ध नहीं होने के कारण इसका यही अर्थ है कि चरक संहिता का अधिक प्रचार होने पर तथा इसके अधिक उपयोगी होने से  अन्य ग्रंथो  की उपेक्षा की गई। वाग्भट ॠषि के अनुसार  भी उनके जीवन काल मे चरकसंहिता और सुश्रुत संहिता का ही अधिक प्रचार था । यद्यपि भारतवर्ष में अनेकों आयुर्वेदिक शास्त्रों की रचनाएं की गई परंतु समय-समय पर आक्रमणकारियों ने भारत की  संस्कृति और शिक्षा  शास्त्रों को नष्ट करने की कोशिश की। परिणाम स्वरूप वर्तमान में कई ऐसे आयुर्वेदिक ग्रंथ है जिनकी लेखन सामग्री आधी अधूरी मिलती है। कुछ आयुर्वेदिक शास्त्र  उपलब्ध है और जो प्रचलन में है और लोकप्रिय भी है।


आयुर्वेद का अर्थ : 
आयुः+वेद = आयुर्वेद, अर्थात आयुर्वेद नाम का अर्थ है जीवन का अमृत रूपी ज्ञान। आयुर्वेद भारत का प्राचीन आयुर्विज्ञान है जिसका संबंध मानव शरीर को स्वस्थ रखने और रोग हो जाने पर रोग से मुक्त करने तथा आयु और बल बढाने से है। यह मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन और स्वास्थ से सम्बन्धित  दर्शन शास्त्र है।



आयुर्वेद की परिभाषा :--
आयुर्वेद वह  प्राचीन चिकित्सा शास्त्र है, जिसका अध्ययन  कर हम  मनुष्य के जीवन में रोग, दुख  एवं व्याधियों  का निवारण कर सुखी एवं स्वस्थ  बना सकते है।
  • (1)अर्थात जो शास्त्र (विज्ञान) आयु (जीवन) का ज्ञान कराता है उसे आयुर्वेद कहते हैं।
  • (2) स्वस्थ व्यक्ति एवं आतुर (रोगी) के लिए उत्तम मार्ग बताने वाला विज्ञान को आयुर्वेद कहते हैं।
  • (3) अर्थात जिस शास्त्र में आयु शाखा (उम्र का विभाजन), आयु विद्या, आयुसूत्र, आयु ज्ञान, आयु लक्षण (प्राण होने के चिन्ह), आयु तंत्र (शारीरिक रचना शारीरिक क्रियाएं) - इन सम्पूर्ण विषयों की जानकारी मिलती है वह आयुर्वेद है।



आयुर्वेद का इतिहास  :--         

विद्वानों के अनुसार संसार की प्राचीनतम्पुस्तके 'ऋग्वेद, 'सामवेद', 'यजुर्वेद', 'अथर्ववेद' है। वेदों का रचना  काल ईसा के ३,००० से ५०,००० वर्ष पूर्व तक का माना है। ऋग्वेद-संहिता में मैं भी आयुर्वेद का जिक्र मिलता है ।चरक, सुश्रुत, काश्यप आदि मान्य ग्रन्थ आयुर्वेद को अथर्ववेद का उपवेद मानते हैं। इससे आयुर्वेद की प्राचीनता सिद्ध होती है। अतः हम कह सकते हैं कि आयुर्वेद की रचनाकाल ईसा पूर्व  से ५०,००० वर्ष  आस-पास या साथ का ही है।  प्राचीन ग्रंथो के अनुसार  इस ज्ञान को मानव कल्याण के लिए निवेदन किए जाने पर देवताओं के वैद्य ने धरती के महान आचार्यों को दिया।                          इस शास्त्र केआदिआचार्य अश्विनीकुमार माने जाते हैं जिन्होने दक्ष प्रजापति के धड़ में बकरे का सिर जोड़ना जैसी कई चमत्कारिक चिकित्साएं की थी। अश्विनी कुमारों से इंद्र ने यह विद्या प्राप्त की। इंद्र ने धन्वंतरि को सिखाया। काशी के राजा दिवोदास धन्वंतरि के अवतार कहे गए हैं। उनसे जाकर अलग अलग संप्रदायों के अनुसार उनके प्राचीन और पहले आचार्यों आत्रेय / सुश्रुत ने आयुर्वेद पढ़ा। अत्रि और भारद्वाज भी इस शास्त्र के प्रवर्तक माने जाते हैं। आय़ुर्वेद के आचार्य ये हैं— अश्विनीकुमार, धन्वंतरि, दिवोदास (काशिराज), नकुल, सहदेव, अर्कि, च्यवन, जनक, बुध, जावाल, जाजलि, पैल, करथ, अगस्त्य, अत्रि तथा उनके छः शिष्य (अग्निवेश, भेड़, जतुकर्ण, पराशर, सीरपाणि, हारीत), सुश्रुत और चरक। ब्रह्मा ने आयुर्वेद को आठ भागों में बाँटकर प्रत्येक भाग का नाम 'तन्त्र' रखा । ये आठ भाग निम्नलिखित हैं :



१) शल्य तन्त्र,
२) शालाक्य तन्त्र,
३) काय चिकित्सा तन्त्र,
४) गृह और भूत विद्या तन्त्र,
५) कौमारभृत्य तन्त्र,
६) अगद तन्त्र,
७) जरावस्था एवम् रसायन तन्त्र और
८) वाजीकरण तन्त्र ।
इस अष्टाङ्ग आयुर्वेद के अन्तर्गत देहतत्त्व, शरीर विज्ञान, शस्त्रविद्या, भेषज और द्रव्य गुण तत्त्व, चिकित्सा तत्त्व और धात्री विद्या भी है। इसके अतिरिक्त उसमें सदृश चिकित्सा (होम्योपैथी), विरोधी चिकित्सा (एलोपैथी) और जलचिकित्सा (हाइड्रोपैथी) प्राकृतिक चिकित्सा (नेचुरोपैथी) योग, सर्जरी, नाड़ी विज्ञान (पल्स डायग्नोसिस)आदि आजकल के अभिनव चिकित्सा प्रणालियों के मूल सिद्धांतों के विधान भी 2500 वर्ष पूर्व ही सूत्र रूप में लिखे पाये जाते हैं । 


आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथ :--

भारतीय आयुर्वेद के मूल ग्रन्थों में काश्यप संहिता, चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, भेलसंहिता तथा भारद्वाज
संहिता में से काश्यप संहिता को अति प्राचीन माना गया है। इसमें महर्षि कश्यप ने शंका समाधान की शैली में दुःखात्मक रोग, उनके निदान, रोगों का पश्रिहार तथा रोग परिहार के साधन (औषध) इन चारों विषयों का भी प्रकार प्रतिपादन किया गया है। इसके पश्चात जीवक ने काश्यप संहिता को संक्षिप्त कर ‘वृद्ध जीवकीय तंत्र‘ नाम से प्रकाशित है। इसके ८ भाग हैं- 
1. कौमार भृत्य, 2. शल्य क्रिया प्रधान शल्य, 3. शालाक्य, 4. वाजीकरण, 5. प्रधार रसायन, 6. शारीरिक-मानसिक चिकित्सा, 7. विष प्रशमन तथा 8. भूत विद्या।
इसी से यह ‘अष्टांग आयुर्वेद' कहताला है। पुनः इन विषयों को प्रतिपादन के अनुसार आठ स्थानों में विभक्त किया गया। इनमें सूत्र स्थान में 30, निदान स्थान में 12, चिकित्सा स्थान में 30, सिद्धि में 12, कल्प स्थान में 12, तथा खिल स्थान/भाग में 80 अध्याय है। इस प्रकार आचार्य जीवक ने कुल 200 अध्यायों में वृद्ध जीवकीय तंत्र को संग्रहीत कर आर्युविज्ञान का प्रचार प्रसार किया। वृद्ध जीवकीय तंत्र नेपाल के राजकीय पुस्तकालय में उपलब्ध है। 



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